छत्तीसगढ़राज्य

हर क्षण रहना होगा जागरूक, जागृति ही साधना है : मनीष सागरजी महाराज

धर्म सभा में उपाध्याय भगवंत ने 7 दिनों के लिए जागृत साधक बनने दिलाया नियम

रायपुर। जीवन में केवल गति कुछ नहीं है। गति के साथ जागृति भी चाहिए। जब गति होती है, फिर जागृति होती है और फिर प्राप्ति होती है। लक्ष्य के प्रति धैर्य और समर्पण चाहिए। केवल जीवन को संयमित करने से ही नहीं होगा। गलतफहमी में ना रहे कि मंजिल मिल ही जाएगी। जीवन को संयमित करने के साथ हर क्षण सावधान व जागरूक रहना होगा। जागृति ही साधना है। ये बातें सोमवार को टेगौर नगर पटवा भवन में जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में परम पूज्य उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने कही।

उपाध्याय भगवंत में कहा कि किसी के पास कितना भी ज्ञान क्यों ना हो, यदि वह ज्ञान को भूलेगा तो वापस गलती कर बैठेगा। हमको केवल जागृत रहने की साधना करनी है। ज्ञान से तो हम लबालब हैं। वास्तव में जब जीना हो तो केवल ज्ञान काम नहीं आता। ज्ञानी कहते हैं सम्यक ज्ञान की आवश्यकता है। सम्यक ज्ञान की परिभाषा ही है “सम्यक ज्ञान जो समय पर आए काम”। यदि हम सोच रहे हैं कि जागृति आ ही जाएगी। इसकी अतिअपेक्षा अपने आप से ना करें। जागृति के लिए सजग रहना होगा।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि सम्यक ज्ञान नहीं बढ़ेगा तो जागृति नहीं आएगी। जागृति नहीं आएगी तो काम नहीं होंगे। जागृति का अभ्यास करना बहुत जरूरी है। हिंसा हो तो जागृति, झूठ हो तो जागृति, चोरी हो तो जागृति और अब्रम्हचर्य हो तो जागृति। हर समय बस जागृति का प्रयास जरूरी है। अभ्यास के साथ-साथ भीतर जागृति का संचार जरूरी है। हम भटके कम से कम, बस सावधान ज्यादा से ज्यादा रहे। ज्ञान लेने में कंजूसी नहीं करना है। ज्ञान को प्रक्रिया में लाकर समय पर काम आने लायक बनाना है। यह केवल जागृति से ही संभव है। वर्तमान में रहना ही जागृति है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि क्रोध का निमित्त मिले लेकिन हम जागृत होंगे तो भीतर से आवाज आएगी शांत रहो। ध्यान ही सजक रहने का अभ्यास है। परिस्थिति नहीं है तो सजग रहो।
ध्यान से पहले ज्ञान और ज्ञान के पहले श्रद्धा की आवश्यकता है। किसी के प्रति समर्पण होगा तभी हम ज्ञान ले पाएंगे। ज्ञान होगा तभी हम ध्यान में रहने का अभ्यास करेंगे। तभी हम कैसी भी परिस्थिति में जी पाएंगे। विपरीत परिस्थिति में जी लिए तभी हम साधना कर पाएंगे।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जागृति में बाधक प्रमाद है। प्रमाण बाहर से नहीं भीतर से ही आता है। हम अपने लक्ष्य को भूलकर कहीं आकर्षित हो जाते हैं तो हम भटक जाते हैं। इसी का नाम प्रमाद है। आप घर से मंदिर के लिए निकले और मंदिर के बाहर गाड़ी पार्क किए। बीच में दोस्त मिल गया तो उससे बात करने लग गए। कितने व्यस्त हो गए कि मंदिर में दर्शन का समय बीत गया। ये प्रमाद इतना जबरदस्त है कि मंदिर में दर्शन छूट गया। आपके प्रमाद ने ही यह काम किया है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि यह सप्ताह जागृति का सप्ताह है। सप्ताह भर जागृति के लिए अभ्यास करना है। जागरुकता का अभ्यास करना है। 6 क्रियाएं हैं जिसमें जागरूक रहना चाहिए। चलते हुए सावधान रहना चाहिए। कहीं भी खड़े हो तो जागरुक रहना चाहिए। कहीं भी बैठे हो तो जागरुक रहना चाहिए। सोना भी हो तो जागृत रहना। बोलना हो तो जागृत रहना। खाना हो तो जागृत करना। इन 6 क्रियाओं में जागृत रहो। जीवों के प्रति दया होनी चाहि। ये सावधानी बरतने पर ही संस्कार बनेंगे। ये अहिंसा की जागृति आएगी तो पर अहिंसा के साथ-साथ स्व अहिंसा तक की जागृति आएगी। जीवन जागृतिमय हो जाएगा। मुझे जागृत साधक रहना है यह अभ्यास होना चाहिए।

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