
रायपुर: भारतीय भाषा समिति (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) एवं कलिंगा विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय भाषा परिवार: नए क्षितिज, नई दृष्टि और भाषाई एकता का भविष्य” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 9–10 जनवरी, 2026 को किया गया।
इस कार्यक्रम में 21 वक्ताओं एवं 179 प्रतिभागियों ने सहभागिता की तथा सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान एवं हिंदी को राष्ट्र की संपर्क भाषा के रूप में प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया। सम्मेलन के दौरान भारतीय भाषा परिवार पुस्तिका का विमोचन भी किया गया।
कलिंगा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आर. श्रीधर ने कार्यक्रम में पधारे सभी अतिथियों का हार्दिक स्वागत किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जनसंपर्क विभाग के अपर निदेशक श्री आलोक देव थे, जिन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सभ्यता की रीढ़ है। उन्होंने शिक्षा, अनुसंधान, सामाजिक एकीकरण, शिक्षा में मातृभाषा के उपयोग तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में भारतीय भाषा समिति की भूमिका की सराहना की।
इस कार्यक्रम में प्रसिद्ध लेखक श्री वरुण श्रीवास्तव भी मौजूद थे, जिन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भाषा राष्ट्रीय एकता की एक अहम कड़ी है, और देश की सभी बोलियाँ और भाषाएँ अपने प्राकृतिक रूप में फलती-फूलती रहनी चाहिए।
पर्यटन विभाग की जनसंपर्क अधिकारी डॉ. अनुराधा दुबे ने भाषाई जागरूकता, भाषाई एकता और परंपरा से डिजिटल युग तक की यात्रा के बारे में विस्तार से बताया।
एमिटी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वाराप्रसाद ने प्राचीन ज्ञान परंपराओं से लेकर समकालीन शिक्षा तक के सफर के बारे में विस्तार से बताया और मातृभाषा के तौर पर हिंदी के महत्व और भारतीय भाषाओं में समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा पर ज़ोर दिया।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए, कलिंगा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आर. श्रीधर ने भारतीय भाषा परिवार के उद्देश्यों के बारे में विस्तार से बताया और कहा कि केंद्र सरकार की भारतीय भाषा समिति भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की भाषाई शक्ति को सुदृढ़ करने के लिए मातृभाषा में शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रशासन अत्यंत आवश्यक हैं।
संयुक्त कलेक्टर सुश्री रुचि शर्मा ने कहा कि भारतीय भाषाएँ केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे समृद्ध वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं तकनीकी ज्ञान परंपराओं की वाहक भी हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि संस्कृत, हिंदी, तमिल, बंगाली एवं मराठी जैसी भाषाओं में विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र तथा दर्शन से संबंधित प्रचुर प्राचीन साहित्य उपलब्ध है।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सुभाष मिश्रा ने कहा कि भारतीय भाषा परिवार पर कोई भी विमर्श तब तक अपूर्ण रहता है, जब तक सिद्धांत, अनुसंधान और नीति आपस में संवाद नहीं करते। सभी भारतीय भाषाओं को समान मंच एवं अवसर प्रदान करने से ज्ञान का विकेंद्रीकरण, सामाजिक न्याय की मजबूती तथा सतत विकास संभव होगा, और यह संगोष्ठी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुई।
सभी आमंत्रित वक्ताओं को उनके बहुमूल्य योगदान के प्रति सम्मान स्वरूप स्मृति-चिह्न, शॉल एवं प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। सभी प्रतिभागियों को किट, नोटबुक एवं सहभागिता प्रमाण पत्र वितरित किए गए। कार्यक्रम का समापन संयोजक डॉ. ए. राजशेखर द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने इस राष्ट्रीय सम्मेलन को सार्थक एवं सफल शैक्षणिक आयोजन बनाने हेतु अतिथियों, वक्ताओं, आयोजकों तथा प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
दो दिवसीय संगोष्ठी के दौरान डॉ. ई. वी. राव, डॉ. अजय शुक्ला, डॉ. अनिल द्विवेदी, डॉ. मोतीलाल शाकर, डॉ. देवेंद्र शुक्ला, डॉ. दुर्गावती भारती, डॉ. अंचल श्रीवास्तव एवं डॉ. दिनेश श्रीवास ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए।
डॉ. योगेश वैष्णव और डॉ. हर्षा शर्मा आयोजन सचिव थे।


